पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Paksha to Pitara  )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

HOME PAGE

Paksha - Panchami  ( words like Paksha / side, Pakshee / Pakshi / bird, Panchachuudaa, Panchajana, Panchanada, Panchamee / Panchami / 5th day etc. )

Panchamudraa - Patanga ( Pancharaatra, Panchashikha, Panchaagni, Panchaala, Patanga etc. )

Patanjali - Pada ( Patanjali, Pataakaa / flag, Pati / husband, Pativrataa / chaste woman, Patnee / Patni / wife, Patnivrataa / chaste man, Patra / leaf, Pada / level etc.)

Padma - Padmabhuu (  Padma / lotus, Padmanaabha etc.)

Padmamaalini - Pannaga ( Padmaraaga, Padmaa, Padmaavati, Padminee / Padmini, Panasa etc. )

Pannama - Parashunaabha  ( Pampaa, Payah / juice, Para, Paramaartha, Parameshthi, Parashu etc. )

Parashuraama - Paraashara( Parashuraama, Paraa / higher, Paraavasu, Paraashara etc)

Parikampa - Parnaashaa  ( Parigha, Parimala, Parivaha, Pareekshita / Parikshita, Parjanya, Parna / leaf, Parnaashaa etc.)

Parnini - Pallava (  Parva / junctions, Parvata / mountain, Palaasha etc.)

Palli - Pashchima (Pavana / air, Pavamaana, Pavitra / pious, Pashu / animal, Pashupati, Pashupaala etc.)

Pahlava - Paatha (Pahlava, Paaka, Paakashaasana, Paakhanda, Paanchajanya, Paanchaala, Paatala, Paataliputra, Paatha etc.)

Paani - Paatra  (Paani / hand, Paanini, Paandava, Paandu, Pandura, Paandya, Paataala, Paataalaketu, Paatra / vessel etc. )

Paada - Paapa (Paada / foot / step, Paadukaa / sandals, Paapa / sin etc. )

 Paayasa - Paarvati ( Paara, Paarada / mercury, Paaramitaa, Paaraavata, Paarijaata, Paariyaatra, Paarvati / Parvati etc.)

Paarshva - Paasha (  Paarshnigraha, Paalaka, Paavaka / fire, Paasha / trap etc.)

Paashupata - Pichindila ( Paashupata, Paashaana / stone, Pinga, Pingala, Pingalaa, Pingaaksha etc.)

Pichu - Pitara ( Pinda, Pindaaraka, Pitara / manes etc. )

 

 

Puraanic contexts of words like Paashupata, Paashaana / stone, Pinga, Pingala, Pingalaa, Pingaaksha etc. are given here.

पाशुपत ब्रह्माण्ड १.२.२७.११६( पाशुपत व्रत के अन्तर्गत भस्म के महत्त्व का कथन ), २.३.४०.६५( परशुराम द्वारा युद्ध में पाशुपत अस्त्र से कार्त्तवीर्य के नाश का कथन ), मत्स्य २२.५६( श्राद्ध योग्य तीर्थों में से एक ), लिङ्ग १.८०.४७( देवों के पशुत्व के विशोधन हेतु शिव द्वारा पाशुपत व्रत के उपदेश का कथन ), २.१८.५३( पाशुपत व्रत की विधि ), वराह ७०.४३( नय सिद्धान्त के विपरीत पाशुपत शास्त्र का कथन, नय सिद्धान्त शास्त्र रूप पाश व पशुभाव के नष्ट होने पर ही वेद संज्ञक पाशुपत शास्त्र के प्रादुर्भाव का कथन ), वामन ६.८७( शिव पूजा हेतु निर्मित ४ सम्प्रदायों में द्वितीय ; भरद्वाज के महापाशुपत आचार्य होने का कथन ), स्कन्द  २.२.१२.५५( पाशुपतास्त्र के सम्बन्ध में विष्णु द्वारा शिव को प्रदत्त वर का कथन : विष्णु के प्रतिकूल होने पर पाशुपतास्त्र का विफल होना ), ५.१.४९.२८( बाणासुर युद्ध में कृष्ण के वैष्णवास्त्र के प्रतीकार स्वरूप शिव द्वारा पाशुपतास्त्र धारण करने का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण ३.१८५.३०( श्वसुर पाशुपतेश द्वारा जामाता मञ्जुलकेश को सुरा मिश्रित भोजन प्रस्तुत करने पर जामाता के शाप द्वारा प्रमत्त बनना, शाप निवृत्ति का वृत्तान्त ), कथासरित् ८.७.५४( सूर्यप्रभ व श्रुतशर्मा के युद्ध के प्रसंग में प्रभास द्वारा विष्णु के अंश दामोदर पर पाशुपतास्त्र का प्रयोग व विष्णु द्वारा प्रतीकार रूप में सुदर्शन चक्र का प्रयोग ), १७.५.७५( मुक्ताफलकेतु द्वारा पाशुपत अस्त्र के स्वरूप का दर्शन ), द्र. पशुपति, महापाशुपतpaashupata

 

पाषाण गणेश २.१३.४१( महोत्कट गणेश द्वारा परशु से पाषाण दैत्य का वध ), नारद १.१२३.५८( पाषाण चर्तुदशी व्रत की विधि ), ब्रह्मवैवर्त्त २.३०.८९( रौप्य आदि पात्रों की चोरी पर नरक में तप्त पाषाण कुण्ड प्राप्ति का कथन ), स्कन्द ३.१.७.५१( सेतु स्थापना के संदर्भ में आरम्भ में राम द्वारा ९ पाषाणों की स्थापना का  उल्लेख ), ३.१.५१.१५(सेतुमूल पर पाषाण दान का निर्देश), ३.१.५१.१८(पाषाण दान विधि), योगवासिष्ठ ६.१.७८.२१( मन की पाषाण से उपमा के कारण का कथन ), ६.२.५६( पाषाणोपाख्यान का आरम्भ ), ६.२.६०.३३, लक्ष्मीनारायण २.१८३.८९( चक्र की वह्नि से पर्वत के पाषाणों के रसात्मक होने का उल्लेख ) paashaana/ pashana

 

पाह्नव शिव ५.३८.३०( राजा बाहु के राज्य का हरण करने वाले ५ राक्षस गणों में से एक )

 

पिङ्ग गर्ग ७.९.१०( शिशुपाल मन्त्रीद्वय रङ्ग व पिङ्ग का प्रद्युम्न - सेनानी भानु से युद्ध व मृत्यु ), ब्रह्माण्ड १.२.३३.१६( मध्यमाध्वर्युओं में से एक - भार्गवो मधुकः पिंगः श्वेतकेतुस्तथैव च ।। ), शिव ३.५.३२( २२वें  द्वापर में लाङ्गली नामक शिव अवतार के ४ पुत्रों में से एक - भल्लवी मधुपिंगश्च श्वेतकेतुस्तथैव च ।। ), स्कन्द ५.१.५६.५४( शनि के नामों में से एक - पिंगश्छायासुतो बभ्रुः स्थावरः पिप्पलायनः ।। ), ७.१.२४६( पिङ्गा नदी का माहात्म्य, पिङ्गली/पिङ्गला नदी ), ७.१.३३३.८( खण्डघट स्थान पर पिङ्गेश लिङ्ग का माहात्म्य - तस्मान्नैर्ऋत्यदिग्भागे स्थानं खंडघटेति च ॥ तत्र पिंगेश्वरो देवः समुद्रतटसन्निधौ ॥ ), ७.४.१७.३०( द्वारका के वायव्य द्वार के रक्षकों में से एक - झंझकामर्दनः पिंगो रुरुः सर्वभुजोव्रणी ॥ ), लक्ष्मीनारायण २.१०८.५७( प्रागुत्तर दिशा में पिङ्ग देश में सम्पन्न वैष्णव यज्ञ का वर्णन - पिंगदेशे किंपुरुषे यज्ञार्थं विष्णुसंहिताः ।। ), २.१०९.७६( पिङ्ग देश के राजा बोधविहङ्गम की वैष्णव गणों से युद्ध में मृत्यु, पिङ्गल - पुत्र पिङ्गकेश द्वारा श्रीहरि की शरण - नाशं प्राप्तस्तथा राजा पिंगो बोधविहंगमः । तत्पुत्राः शतसंख्याश्च विज्ञविहंगमादयः ।। ), २.११०.६८( यज्ञ के पश्चात् पिङ्गदेश का राज्य पिङ्गकेश राजकुमार को प्राप्त होने का उल्लेख - दीयते प्राचीनराज्यं विज्ञविहंगमाय च । पिंगचिपिंगराज्यं तु पिंगकेशाय दीयते ।। ), कथासरित् ९.६.९३( राजा विमल के मन्त्री पिङ्गदत्त द्वारा राजा के षण्ढ पुत्र के लिए यक्ष से पुंस्त्व प्राप्त करने का परामर्श ), १७.१.६१( शिव गणों पिङ्गेश्वर व गुहेश्वर द्वारा पार्वती से शाप प्राप्ति का वृत्तान्त - तद्दृष्ट्वान्यौ गणौ नाम्ना पिङ्गेश्वरगुहेश्वरौ । बभूवतुः स्मितमुखावन्योन्याननदर्शिनौ ।। ) pinga

 

पिङ्गल कूर्म २.४२.३५( पिङ्गलेश्वर तीर्थ का माहात्म्य - ततो गच्छेत राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम् । तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते ।। ), गणेश २.१०.१०( महोत्कट द्वारा अक्षतों में छिपे पिङ्गल आदि ५ राक्षसों का वध ), २.२७.३१, २.२.३६( पिङ्गल राक्षस के पूर्व जन्मों का वृत्तान्त : पूर्व जन्म में दुष्टबुद्धि नाम से मन्त्री, गणेश - पूजा का फल प्राप्त करना ), देवीभागवत ७.३०( पिङ्गलेश्वरी : पयोष्णी तीर्थ में देवी का नाम ), पद्म १.४०.८४( सुरभि व ब्रह्मा - पुत्र, एकादश रुद्रों में से एक ), ६.१०.३७( जालन्धर की कथा में कीर्तिमुख की पिङ्गल संज्ञा - त्र्याननस्त्रिचरणस्त्रिपुच्छः सप्तहस्तवान् । स च कीर्तिमुखो नाम पिंगलो जटिलो महान् । ),  ६.१३३.२३( पयोष्णी में पिङ्गल तीर्थ का उल्लेख - महालयं महापद्मे पयोष्ण्यां पिंगलेश्वरम् ), ६.१७९( परदारा रत विप्र पिङ्गल का मृत्यु पश्चात् गृध्र बनना, गीता के पञ्चम अध्याय श्रवण से मुक्ति ), ब्रह्माण्ड २.३.४१.२७( शिव के गणों में से एक पिङ्गलाक्ष का उल्लेख ), भविष्य १.१२४.१९( सूर्य - अनुचर, अग्नि का रूप - लिखते यः प्रजानां च सुकृतं यच्च दुष्कृतम् ।। अग्निर्दक्षिणपार्श्वे तु पिंगलत्वात्स पिंगलः ।। ), २.१.१७.१०( सीमन्त कर्म में अग्नि का नाम - गर्भाधाने च मरुतः सीमंते पिंगलः स्मृतः ।। पुंसवे त्विंद्र आख्यातः प्रशस्तो यागकर्मणि ।। ), ३.४.१८.४६( पिङ्गलस्पति : अश्विनौ का नाम, पिङ्गलस्पति का रैदास के रूप में अवतरण - द्वितीयश्च नृणां राशेः सावर्णिर्भ्रमकारकः ।। तस्य शान्तिकरो भूमौ भविता पिंगलापतिः ।। ), ४.१३०.३( पिङ्गल तापस द्वारा जाम्बवती को शरीर को तेज आदि से युक्त करने के लिए दीप दान की महिमा का वर्णन ), मत्स्य १५३.१९( ११ रुद्रों में से एक ), १७१.३९( ११ रुद्रों में से एक ), १९१.३२( पिङ्गलेश्वर तीर्थ का माहात्म्य - ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र! पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्। अहोरात्रोपवासेन त्रिरात्रफलमाप्नुयात् ।। ), १९५.२५( पैङ्गलायनि : भृगु गोत्र प्रवर्तक ऋषियों में से एक ), १९६.१८( पिङ्गलि : पिङ्गल ऋषियों के गोत्र प्रवरों का कथन ), २६१.५( सूर्य के प्रतीहार - द्वय में से एक पिङ्गल के स्वरूप का कथन - प्रतिहारौ च कर्तव्यौ पार्श्वयोर्दण्डिपिङ्गलौ। कर्तव्यौ खड्गहस्तौ तौ पार्श्वयोः पुरुषावुभौ ।।.. ), वराह ८१.५( अनेकपर्वता(पवता?) नामक गन्धर्वों के अधिपति के रूप में एकपिङ्गल का उल्लेख - तत्र चानेकपर्वता नाम गन्धर्वा युद्धशालिनो वसन्ति । तेषां चाधिपतिर्देवो राजराजैकपिङ्गलः । ), वामन ५७.६४( रवि द्वारा स्कन्द को प्रदत्त गण का नाम ), ५८.५६( पिङ्गल द्वारा दण्ड से असुरों का संहार ), वायु ३६.२७(कपिल व पिङ्गल -- मेरु के पश्चिम में स्थित पर्वतों में से दो - महालयं महापद्मे पयोष्ण्यां पिंगलेश्वरम्), विष्णुधर्मोत्तर ३.६७.७( सूर्य के गण पिङ्गल की मूर्ति का रूप - लेखनीपत्रककरः कार्यो भवति पिङ्गलः । ), शिव ३.१८.२६( कपाली व पिङ्गल -- सुरभि व कश्यप के ११ रुद्र पुत्रों में से प्रथम दो ), स्कन्द  ४.२.५३.५८( पिङ्गल गण द्वारा काशी में स्थापित पिङ्गलेश्वर लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य ), ४.२.५५.२( शिवगण द्वारा पिङ्गलेश्वर शिव की स्थापना का उल्लेख, संक्षिप्त माहात्म्य - गणेन पिंगलाख्येन पिंगलाख्येशसंज्ञितम् ।। लिंगं प्रतिष्ठितं शंभोः कपर्दीशादुदग्दिशि ।। ), ४.२.९७.२१४( पिङ्गल द्वारा लाङ्गलीश लिङ्ग की आराधना से मोक्ष की प्राप्ति - तत्पूर्वे लांगलीशश्च सर्वसिद्धिसमर्पकः ।। ),५.१.२६.६( महाकाल के पूर्व दिशा के द्वाराध्यक्ष के रूप में पिङ्गलेश का उल्लेख, एकादशी को अर्चना, अन्य दिशाओं में अन्य ईश्वर - पिंगलेशः स्थितः पूर्वे बालरूपो विभावसुः ।। ), ५.१.२६.२४( पिङ्गल हेतु रथ दान का निर्देश - रथं पिंगलके दद्याद्गजं कायावरोहणे ।। ), ५.२.८१.३०( पिङ्गलेश्वर का माहात्म्य ; महाकालवन में चारों दिशाओं में लिङ्ग की स्थितियां, पूर्व दिशा के रक्षक के रूप में धनाध्यक्ष पिङ्गलेश की नियुक्ति का कथन, माता - पिता के आश्रय से हीन पिङ्गला द्वारा पिङ्गलेश्वर की पूजा, पिङ्गला के पूर्व जन्म का वृत्तान्त ), ५.२.८१.३८( पिङ्गाक्षी - पति, पिङ्गला - पिता, पिङ्गला कन्या का वृत्तान्त ), ५.३.८३.४३( हनूमन्तेश्वर में अस्थिक्षेपण करने वाले विप्र पिङ्गल का शतबाहु राजा से संवाद ), ५.३.८६( पिङ्गलावर्त का माहात्म्य : हव्यवाहन द्वारा रुद्र रेतस भक्षण के कष्ट से मुक्ति हेतु पिङ्गलेश्वर लिङ्ग की स्थापना ), ५.३.१७६.१( पिङ्गलान्त का माहात्म्य : देवखात का माहात्म्य, अग्नि की सेवा से मुक्ति, तपोरत अग्नि को तीर्थों से आहृत जल द्वारा चन्द्र व सूर्य रूपी नेत्रों की प्राप्ति का वृत्तान्त ), ५.३.१९८.८२( पयोष्णी में देवी की पिङ्गलेश्वरी नाम से स्थिति का उल्लेख ), ७.१.११.२०७( सूर्य द्वारा पिङ्गल व दण्डनायक गणद्वय को रेवन्त का पीछा करके अश्व को वापस लाने का निर्देश ) ७.१.२४७.१( पार्वती रूप धारिणी देवी पिङ्गला का उल्लेख ), हरिवंश ३.३७.२४( उत्तर दिशा के अधिपति के रूप में पिङ्गल का उल्लेख - पुलस्त्यपुत्रो द्युतिमान्महेन्द्रप्रतिमः प्रभुः ।। एकाक्षः पिङ्गलो नाम सौम्यायां दिशि पार्थिवः।।  ), लक्ष्मीनारायण २.१०९.७६ ( यज्ञ के अवभृथ स्नान के संदर्भ में पिङ्गलक के निर्देश पर चिपिङ्ग योद्धाओं का विनायकों से युद्ध व मृत्यु ; पिङ्गलक - पुत्र पिङ्गकेश द्वारा श्रीहरि की शरण ), कथासरित् ८.२.३५२( पिङ्गल - कन्या केसरावली के सूर्यप्रभ - भार्या बनने का उल्लेख ), १०.४.१८( पिङ्गलक नामक सिंह द्वारा शरणागत वृष को भक्ष्य बनाने की कथा ) pingala

महाभारत द्रोण १४६.१०७ (प्रदीप्तोल्कमभवच्चान्तरिक्षं मृतेषु देहेष्वपतन्वयांसि। यत्पिङ्गलज्येन किरीटमाली क्रुद्धो रिपूनाजगवेन हन्ति।।)

Comments on Pingala

  

पिङ्गलगन्धार कथासरित् १४.२.७३( पिङ्गल गान्धार विद्याधर अधिपति की कन्या प्रभावती द्वारा नरवाहनदत्त को प्रेरित करने का वृत्तान्त ), १४.३.५७( पिङ्गल गान्धार द्वारा स्व जामाता नरवाहनदत्त को हिमालय के दक्षिण व उत्तर भागों पर विजय के लिए प्रेरित करना ) pingalagandhaara

 

पिङ्गला नारद २.४८.२१( पिङ्गला नाडी : काशी की शुष्क असि नदी का रूप - पिंगला नाम यत्तीर्थं आग्नेयी सा प्रकीर्तिता ।। शुष्का सरिच्च सा ज्ञेया लोकार्को यत्र तिष्ठति ।।  ), ब्रह्माण्ड २.३.७.३४६( कुमुद हस्ती व पिङ्गला से उत्पन्न हस्ती पुत्रों का कथन - जज्ञे चान्द्रमसः साम्नः कुमुदः कुमुदद्युतिः ॥ पिङ्गलायां सुतौ तस्य महापद्मोर्मिमालिनौ । ), ३.४.३३.७०( मारुतनाथ की ३ शक्तियों में से एक ), भागवत १०.४७.४७( गोपियों द्वारा वेश्या पिङ्गला के कथन को उद्धृत करना : निराशा परम सुख - परं सौख्यं हि नैराश्यं स्वैरिण्यप्याह पिङ्गला। तज्जानतीनां नः कृष्णे तथाप्याशा दुरत्यया ), ११.७.३४( दत्तात्रेय के गुरु के रूप में पिङ्गला का कथन - मधुहा हरिणो मीनः पिङ्गला कुररोऽर्भकः।.. ), ११.८.२२(अहो मे मोहविततिं पश्यताविजितात्मनः । या कान्ताद् असतः कामं कामये येन बालिशा ॥), मत्स्य १७९.२३( अन्धकासुर के रक्त पानार्थ शिव द्वारा सृष्ट मातृकाओं में से एक ), वायु ६९.२२९/२.८.२२३( चन्द्रमस् साम से कुमुदद्युति पिङ्गला की उत्पत्ति, पिङ्गला के पुत्रों महापद्म व ऊर्मिमाली का कथन - जज्ञे चन्द्रमसः साम्नः पिङ्गला कुमुदद्युतिः। पिङ्गलायाः सुतौ तस्या महापद्मोर्मिमालिनौ ॥  ), शिव २.५.४१.६२( गण्डकी तीर पर कीटों द्वारा स्थल पर गिराए गए पत्थरों की संज्ञा/अवर नाम, शुक - माता ), स्कन्द ३.३.१०( मन्दर विप्र द्वारा पिङ्गला वेश्या का सेवन, पिङ्गला द्वारा ऋषभ योगी की सेवा - अवंतीविषये कश्चिद्ब्राह्मणो मंदराह्वयः ।।स वेश्यां पिंगलां नाम रममाणो दिवानिशम् ।। ), ३.३.११.१( पिङ्गला का जन्मान्तर में चन्द्राङ्गद व सीमन्तिनी - पुत्री कीर्तिमालिनी बनना - चन्द्रांगदस्य सा भूयः सीमंतिन्यामजायत ।। रूपौदार्यगुणोपेता नाम्ना वै कीर्तिमालिनी ।। ), ३.३.१३.६२( ऋषभ के निर्देश पर कीर्तिमालिनी का राजपुत्र भद्रायु से विवाह - आवेद्य रहसि प्रेम्णा त्वत्सुतां कीर्तिमालिनीम् ।। भद्रायुषे प्रयच्छेति बोधयित्वा च नैषधम् ।। ), ५.२.८१.४१( पिङ्गल व पिङ्गाक्षी - पुत्री, माता - पिता से वियोग होने पर पिङ्गलेश्वर की पूजा से मुक्ति, पूर्वजन्म में वेश्या होने का वृत्तान्त ), ६.१४८.१( जाबालि - कन्या व व्यास - भार्या वटिका का उपनाम?, पुत्र प्राप्ति हेतु तप ), ६.१८४.१५( यज्ञ में आगत अतिथि द्वारा राजा सुतपा - भार्या पिङ्गला से प्राप्त आशा त्याग की शिक्षा का कथन - आशानिराशां कृत्वा च सुखं स्वपिति पिंगला ॥ न करोति च शृंगारं न स्पर्धां च कदाचन॥ ), ७.१.२४७.१( पार्वती रूप धारी नदी पिङ्गला का माहात्म्य - तत्रैव संस्थितं पश्येत्सूर्यं पापप्रणाशनम् ॥ तथा च पिंगलां देवीं पार्वतीरूपधारिणीम् ॥ ), लक्ष्मीनारायण १.१६१.७( भद्रा नदी के पिङ्गला का रूप होने का उल्लेख - इडा ओजस्वती बोध्या भद्रा तु पिंगला मता । स्वर्णरेखा सुषुम्णाऽस्ति तया मोक्षमवाप्नुयात् ।।  ), १.३११.४३( सुषुम्ना व पिङ्गला द्वारा कृष्ण पर चामर धारण का उल्लेख - इडा छत्रं दधाराऽस्य शिरसि स्वर्णभास्वरम् ॥ सुषुम्णा पिंगला श्वेते दध्यतुश्चामरे ह्युभे । ), १.५१०.४४( यज्ञ में अतिथि द्वारा पिङ्गला वेश्या से ग्रहण की गई आशा त्याग की शिक्षा का कथन - तस्याऽप्यन्तःपुरे चासीत् पिंगला नाम नायिका । रात्रौ सुखं स्वपित्येव पतिहीना निरीहिणी ।।), २.४८.३( ब्रह्मा की ३ पुत्रियों में से एक, बालकृष्ण को पतिरूप में ग्रहण करके पिता के गृह को जाना- सूर्यवद्रूपसम्पन्नाः सुषुम्णेडा च पिङ्गला । तिस्रः कन्याः कुमार्यश्चाऽनुज्ञया वेधसो भुवि ।। ), ३.४४.१९( कर्णमूलों में पिङ्गला व शृङ्गली नामक कृमियों की स्थिति का उल्लेख ), ४.१०१.१०९( कृष्ण की ११२ पत्नियों में से एक, पीताम्बर व आत्मबोधिनी माता - पिंगलायाः सुतः पिताम्बरः सुताऽऽत्मबोधिनी ।।  ) pingalaa

 

पिङ्गली पद्म २.५३.९८( कर्णमूल में कृमि का नाम ), स्कन्द ७.१.२४६.१( पिङ्गली नदी के माहात्म्य का कथन : रूप की प्राप्ति ), लक्ष्मीनारायण १.३७८.३३( भालुक नामक शूद्र जार के रोगग्रस्त होने पर पिङ्गली वेश्या द्वारा धन का हरण करके अन्यत्र जाने का कथन ), कथासरित् ४.१.३८( दरिद्र पिङ्गलिका ब्राह्मणी द्वारा रानी वासवदत्ता को राजकुमार की वैश्य कुल की पत्नी के दुराचार की कथा सुनाना ), ४.१.१२२( पिङ्गलिका द्वारा वासवदत्ता को स्ववृत्तान्त सुनाना, देवर शान्तिकर से मिलन आदि ) pingalee/ pingali

 

पिङ्गा पद्म ३.२४.६( पिङ्गा तीर्थ के माहात्म्य का उल्लेख : शत कपिला दान के फल की प्राप्ति - पिंगातीर्थमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी नराधिप । कपिलानां नरव्याघ्र शतस्य फलमाप्नुयात् । ), स्कन्द ७.१.२४६( पिङ्गली / पिङ्गा नदी का माहात्म्य : रूप की प्राप्ति - अत्र स्नाता वयं सर्वे यतः पिंगत्वमागताः ॥ अतः प्रभृति नामास्यास्ततः पिंगा भविष्यति ॥) pingaa

 

पिङ्गाक्ष गणेश २.१०.१०( महोत्कट गणेश द्वारा अक्षतों में छिपे पिङ्गाक्ष आदि ५ राक्षसों का वध - विघातश्चैव पिंगाक्षो विशालः पिंगलस्तथा । चपलश्च महापुंड्रा अक्षमालाविभूषिताः ।। ), २.२६.९( पिङ्गाक्ष राक्षस द्वारा शमीपत्रों से वामन गणेश की अनायास पूजा का वृत्तान्त ), ब्रह्माण्ड २.३.७.१२३( मणिभद्र यक्ष व पुण्यजनी के २४ पुत्रों में से एक ), वायु २३.२००/१.२३.१८८(  २२वें द्वापर में लाङ्गलि अवतार के पुत्रों में से एक ), स्कन्द १.२.६२.२५( क्षेत्रपालों के ६४ प्रकारों में से एक ), ४.१.१२.१७( पिङ्गाक्ष भिल्ल द्वारा तीर्थयात्रियों के प्राणों की रक्षा से लोकपालत्व की प्राप्ति ), ५.२.८१.३८( भार्या पिङ्गाक्षी की मृत्यु पर पिङ्गल विप्र का वन गमन, पिङ्गल - पुत्री पिङ्गला का वृत्तान्त ), ५.३.८३.३०( हनुमान के नामों में से एक ), लक्ष्मीनारायण ४.१०१.१०७( कृष्ण - पत्नी हिरण्मयी की सुता पिङ्गाक्षिणी व सुत  मौक्तिक का उल्लेख ) pingaaksha

 

पिचिण्डिल स्कन्द ४.२.५७.९५( पिचिण्डिल देव का संक्षिप्त माहात्म्य )